
एक्सक्लूसिव : बुंदेलखंड में भी महाकाल का मंदिर, 7 साल में आए 108 पुष्य नक्षत्रों में हुआ निर्माण
प्रत्येक सोमवार लगता है भक्तों का तांता
दिवाकर वर्मा , बांदरी ( स्वदेश संवाददाता )। उज्जैन भगवान महाकाल के मंदिर की तरह ही हूबहू दिखने वाला एक और मंदिर भी है जो बांदरी से 5 किलोमीटर दूर बुंदेलखंड के सागर जिले के ग्राम खेजरादुगाहा में है। उज्जैन के महाकालेश्वर मंदिर की तरह पूजा-अर्चना का दौर यहां भी जारी है।यहां आने वाले भक्तों की संख्या बढ़ गई है। यूं तो यहां पूरे साल भक्तों का तांता लगा रहता है। पर प्रत्येक सोमवार, सावन माह तथा शिव रात्रि पर भक्तों की लंबी कतारें लगतीं हैं। जिसमें दूर-दूर से भक्त आते हैं। मंदिर के गर्भगृह के पट खुलते ही सबसे पहले प्रतिदिन बाबा महाकाल की आरती होती है। इसके बाद भगवान का श्रृंगार होता है और फिर श्रद्धालु दर्शन करने पहुंचते हैं। यहां भी प्रति सोमवार को भस्मारती की जाती है। यह आरती ठीक उसी प्रकार से होती है जैसे उज्जैन के महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर में होती है। यहां सात साल में आए 108 पुष्य नक्षत्रों में उज्जैन महाकाल के हुबहु मंदिर का निर्माण श्रमदान से कराया गया। शिवलिंग, प्रवेश-निकास सब कुछ दिशा और डिजाइन में महाकाल मंदिर की तर्ज पर तैयार किया गया है। खेजरादुगाहा के महाकाल मंदिर निर्माण की सबसे खास बात यह है कि इसका निर्माण कार्य सिर्फ पुष्य नक्षत्र के दिन ही किया गया है। यानी माह में सिर्फ एक दिन ही निर्माण हुआ।
जय महाकाल सेवा समिति खेजरादुगाहा दरबार के संयोजक पं. महेश तिवारी गुरुजी ने बताया वर्ष 2015 के पुष्य नक्षत्र से लेकर अब तक बिलकुल ऐसा ही चला। इस दौरान कुल 108 पुष्य नक्षत्र में हुए कार्य से ही मंदिर की संरचना से लेकर, महाकाल की मूर्ति, प्रवेश स्थल से लेकर काफी कुछ उज्जैन की तरह हूबहू काम जनसहयोग से किया गया है। महाकाल की वैदिक मंत्रों से प्रतिष्ठा की गई है। इस तरह उज्जैन मंदिर में प्रवेश के लिए गुफानुमा रास्ते और दक्षिण दिशा से जाना पड़ता है ठीक वैसे भी यहां भी गुफा तैयार होगी। नंदी गृह से वापसी होगी। यहां पर उज्जैन मंदिर के पास जैसा रूद्र सागर तालाब है, वैसे ही यहां भी कराया जाएगा। गर्भ गृह के ठीक ऊपर दूसरा कक्ष भी बन रहा है। मंदिर के बाहर की नक्काशी भी जस की तस होना है। अंतर होगा तो सिर्फ क्षेत्रफल का। महाकाल मंदिर के निर्माण की प्रेरणा खेजरादुगाहा के कर्मवीर योगी संत इमरत प्रसाद तिवारी दद्दाजी से उनके पुत्र पं. परशुराम तिवारी, पं. महेश तिवारी व पं. रमेश तिवारी को प्राप्त हुई। दद्दाजी के एक प्रख्यात विद्वान के रूप में पहचान थी। इससे उनसे जुड़े देशभर से श्रद्धालु यहां पहले से ही आते रहे हैं। दद्दाजी की प्रेरणा ने तिवारी परिवार के जीवन में जीवन में हलचल पैदा कर दी और उन्होंने महाकाल निर्माण करने का संकल्प लिया। खेजरादुगाहा में हूबहू महाकाल मंदिर बनाने के पीछे की वजह बताते हुए वे कहते हैं कि बुंदेलखंड क्षेत्र में गरीब तबके के ज्यादातर लोग ऐसे हैं जो भगवान महाकाल के दर्शन नहीं कर पाते हैं। ऐसे भक्तों के लिए भगवान महाकाल की प्रतिकृति की स्थापना की गई है ताकि भक्त यहां आकर भगवान महाकाल के दर्शन कर सकें। दर्शन के दौरान उन्हें अहसास हो की वह उज्जैन में ही भगवान महाकाल के दर्शन कर रहे हैं। खास बात यह भी है कि सावन सोमवार को यहां श्रद्धालुओं का सैलाब उमड़ रहा है। विशेष त्योहारों पर फोर लेन पर जाम की स्थिति बन जाती है।
परिकल्पना को साकार करना अत्यंत दुष्कर थाः पं. रमेश तिवारी कहते हैं इस परिकल्पना को साकार करना अत्यंत दुष्कर कार्य था। लेकिन उनके बड़े भाई पं.परशुराम तिवारी ने तो ठान ली थी, सो गहन अध्ययन एवं अंतर्ज्ञान ने उन्हें प्रेरित किया, कदम आगे बढ़ाने को और फिर उनके साथ इस स्वप्न को साकार करने के लिए जुटने लगे अनेक शिष्य, वास्तुविद्, अभियंता एवं दानी बंधुगण। मंदिर के रूपांकन में शास्त्रों के अनुसार ज्यामितीय आकार, परिक्रमा, गर्भगृह, प्रमुख देवता, अन्य देवतागण एवं उपयोग में आने वाली भवन सामग्री का सांगोपांग ध्यान रखा गया। भारतीय वास्तुकला के नियम का प्रयोग किया गया। महाकाल मंदिर में भगवान की स्थापना करने के लिए जयपुर में शिवलिंग का निर्माण कराया गया। शिवलिंग निर्माण में ध्यान रखा गया कि उक्त शिवलिंग महाकाल मंदिर में विराजे भगवान महाकाल की प्रतिकृति हो। जिसके बाद शिवलिंग का निर्माण कराया गया। सिंहस्थ 2016 के दौरान जो भी संत महात्मा इस मार्ग से उज्जैन गए वह यहां जरूर रुके। सिंहस्थ के दौरान पूरे माह भर यहां साधु-संतों का समागम होता रहा था, क्योंकि यहां पर पहले से ही सिर्फ महाकाल की ही पूजा होती है।
मनमोहक करते हैं श्रृंगार : भगवान महाकाल का प्रतिदिन श्रृंगार किया जाता है। पर प्रत्येक सोमवार को महाकाल का विशेष मनोहारी श्रृंगार किया जाता है। मंदिर के पुजारी ने बताया कि हर रोज बाबा का शृंगार अलग-अलग रूप में किया जा रहा है। वे कहते हैं कि शृंगार और अभिषेक से भगवान शिव प्रसन्न हो जाते हैं। बाबा का अभिषेक तथा शृंगार करने से मन को भी शांति मिलती है। भगवान शिव को चंदन ओर रोली का शृंगार सबसे अधिक प्रिय है। भस्म शृंगार में बाबा की जब तक आरती होती है। तब तक सूती कपड़े से बाबा पर भस्म को अखंड चढ़ाई जाती है।
कैसे पहुंचे खेजरादुगाहा के महाकालधाम : महाकालधाम जाने के लिए फोरलेन के सागर झांसी मार्ग के बांदरी और मेहर के बीच पश्चिम दिशा में स्थित खेजरा फाटक तक आने के लिए सागर व ललितपुर से बड़ी संख्या में यात्री बसें चलती हैं। यहां आकर बस से उतरकर एक किमी पैदल चलकर महाकालधाम में पहुंचा जा सकता है।
