प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी के नेतृत्व एवं गृह मंत्री अमित शाह जी के संकल्प से बना ‘‘नक्सल मुक्त भारत‘‘ : श्री सिंह
सागर। पूर्व गृहमंत्री एवं वरिष्ठ विधायक श्री भूपेन्द्र सिंह ने कहा कि वर्ष 2014 में देश के लगभग 126 जिले नक्सल प्रभावित माने जाते थे। उस समय नक्सलवाद केवल कानून-व्यवस्था की समस्या नहीं रह गया था, बल्कि भारत की आंतरिक सुरक्षा, लोकतांत्रिक व्यवस्था और विकास यात्रा के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन चुका था। जंगलों से लेकर दूरस्थ आदिवासी अंचलों तक “रेड कॉरिडोर” का भय फैल चुका था। अनेक क्षेत्रों में शासन की पहुंच कमजोर पड़ गई थी और विकास कार्य बाधित हो रहे थे। लेकिन प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व और केन्द्रीय गृह मंत्री श्री अमित शाह की दृढ़ रणनीति ने उस चुनौती को निर्णायक रूप से परास्त कर दिया। आज भारत नक्सलवाद के सबसे अंधकारमय दौर से निकलकर आत्मविश्वास के साथ “नक्सल मुक्त भारत” की दिशा में आगे बढ़ चुका है। भूपेन्द्र सिंह ने कहा कि केन्द्रीय गृह मंत्री श्री अमित शाह ने कई बार स्पष्ट रूप से कहा कि भारत को मार्च 2026 तक “नक्सल मुक्त” बनाया जाएगा। यह केवल राजनीतिक घोषणा नहीं थी, बल्कि एक स्पष्ट रोडमैप और मजबूत इच्छाशक्ति का परिणाम थी। 18 मई 2026 को छत्तीसगढ़ के बस्तर में आयोजित 26वीं केंद्रीय क्षेत्रीय परिषद की ऐतिहासिक बैठक में श्री अमित शाह ने यह ऐतिहासिक घोषणा की कि भारत अब लगभग पूर्ण रूप से “नक्सल मुक्त” हो चुका है। यह घोषणा केवल सुरक्षा उपलब्धि नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था, संवैधानिक मूल्यों और विकास आधारित शासन मॉडल की ऐतिहासिक विजय थी। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र सरकार ने “सुरक्षा और विकास” दोनों को साथ लेकर चलने की नीति अपनाई। भारतीय जनता पार्टी के शासनकाल में नक्सलवाद के प्रभाव और हिंसा में ऐतिहासिक कमी दर्ज की गई। सरकार इसे देश की सबसे बड़ी आंतरिक सुरक्षा सफलताओं में से एक मानती है। वर्ष 2026 भारत के आंतरिक सुरक्षा इतिहास में एक युगांतरकारी और अद्वितीय मील का पत्थर बनकर उभरा है। भूपेन्द्र सिंह ने कहा कि एक समय था जब नक्सलवाद देश के लगभग एक तिहाई हिस्से में हिंसा का पर्याय बन चुका था। हजारों जवानों, पुलिसकर्मियों और निर्दोष नागरिकों ने अपने प्राण गंवाए। 2000 के दशक के मध्य तक नक्सलवाद 126 से अधिक जिलों में फैल चुका था। उस समय अधिकांश विश्लेषक इसे “रेड कॉरिडोर” के नाम से जानते थे। पूर्ववर्ती सरकारों के दौर में इस समस्या को मुख्य रूप से “अल्प-विकास” से जोड़कर देखा गया, लेकिन निर्णायक रणनीतिक हस्तक्षेप का अभाव बना रहा।उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने नक्सलवाद को केवल सुरक्षा चुनौती के रूप में नहीं देखा, बल्कि इसे विकास, सुशासन और लोकतांत्रिक अधिकारों से जोड़ा। वहीं केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने इस सोच को धरातल पर उतारते हुए बहुआयामी रणनीति लागू की। उन्होंने सुरक्षा बलों को आधुनिक संसाधन, तकनीक और मजबूत खुफिया नेटवर्क उपलब्ध कराया। साथ ही नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में सड़क, बिजली, मोबाइल नेटवर्क, स्वास्थ्य सेवाएं, बैंकिंग सुविधाएं और शिक्षा का विस्तार तेज गति से किया गया। भूपेन्द्र सिंह ने कहा कि श्री अमित शाह की रणनीतिक सफलता 2017 में लागू किए गए बहुआयामी “समाधान” सिद्धांत पर आधारित रही। यह केवल सुरक्षा मॉडल नहीं, बल्कि एक व्यापक कार्यप्रणाली थी। इसमें स्मार्ट नेतृत्व, आक्रामक रणनीति, बेहतर प्रशिक्षण, कार्रवाई योग्य खुफिया जानकारी, तकनीकी निगरानी, ड्रोन और उपग्रह आधारित मैपिंग, डैशबोर्ड मॉनिटरिंग और वित्तीय नेटवर्क पर प्रहार जैसे अनेक आयाम शामिल थे। इस रणनीति ने पारंपरिक पुलिसिंग को आधुनिक युद्धकला में परिवर्तित कर दिया। उन्होंने कहा कि लोकसभा में श्री अमित शाह ने बताया कि अभियानों की सफलता और जवानों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए पिछले एक दशक में 68 नाइट-लैंडिंग हेलीपैड बनाए गए। इससे रात के समय माओवादियों को मिलने वाला सामरिक लाभ समाप्त हो गया। इसके अतिरिक्त सुरक्षा बलों को 400 बुलेट प्रूफ और ब्लास्ट-प्रूफ वाहन उपलब्ध कराए गए। घायल जवानों के त्वरित उपचार के लिए 5 अत्याधुनिक अस्पताल स्थापित किए गए। भूपेन्द्र सिंह ने कहा कि गृह मंत्रालय ने नक्सल विरोधी अभियानों में तकनीकी हस्तक्षेप को सर्वोच्च प्राथमिकता दी। फोरेंसिक जांच प्रणाली मजबूत की गई, लोकेशन ट्रैकिंग सिस्टम को उन्नत किया गया, मोबाइल गतिविधियों की निगरानी को राज्य पुलिस के साथ साझा किया गया तथा वैज्ञानिक कॉल-लॉग विश्लेषण प्रणाली विकसित की गई। सोशल मीडिया विश्लेषण के माध्यम से नक्सलियों के छिपे नेटवर्क और समर्थकों की पहचान की गई। उन्होंने कहा कि वामपंथी उग्रवादियों के आर्थिक नेटवर्क को ध्वस्त करने के लिए वर्ष 2016 में केंद्र और राज्य स्तर पर बहु-अनुशासनात्मक समूह बनाए गए। इन समूहों ने लेवी वसूली, अवैध फंडिंग और तथाकथित “अर्बन नक्सल” नेटवर्क पर कठोर कार्रवाई की। परिणामस्वरूप नक्सली संगठन आर्थिक रूप से कमजोर पड़ते चले गए। भूपेन्द्र सिंह ने कहा कि वर्ष 2024-25 में छत्तीसगढ़ में चलाए गए “ऑपरेशन कगार” को वामपंथी उग्रवाद के ताबूत में अंतिम कील माना गया। इस अभियान ने नक्सल संगठनों की रीढ़ तोड़ दी। वर्ष 2025 के दौरान सुरक्षा बलों ने 1,022 नक्सलियों को गिरफ्तार किया और 2,337 नक्सलियों का आत्मसमर्पण कराया। यह संगठनात्मक विघटन का सबसे बड़ा संकेत था। उन्होंने कहा कि अमित शाह ने इस ऐतिहासिक सफलता को तीन महत्वपूर्ण तारीखों से जोड़ा। उन्होंने कहा कि 21 जनवरी 2024 को छत्तीसगढ़ में नई सरकार बनने के बाद नक्सलवाद पर पहली निर्णायक बैठक हुई। 24 अगस्त 2024 को सभी राज्यों के पुलिस महानिदेशकों की बैठक में 31 मार्च 2026 तक देश को नक्सल मुक्त बनाने का संकल्प लिया गया। तीसरी तारीख 31 मार्च 2026 थी, लेकिन उससे पहले ही भारत ने यह लक्ष्य प्राप्त कर लिया। भूपेन्द्र सिंह ने कहा कि प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी और अमित शाह ने केवल सैन्य कार्रवाई पर जोर नहीं दिया, बल्कि आदिवासी समाज के विश्वास को जीतने को प्राथमिकता दी। आदिवासी बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देने के लिए 259 “एकलव्य मॉडल आवासीय विद्यालय” स्वीकृत किए गए, जिनमें से 179 विद्यालय पूर्ण रूप से संचालित हो चुके हैं। युवाओं को रोजगार और कौशल विकास से जोड़ने के लिए 48 औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थान स्वीकृत किए गए, जिनमें 46 सुचारू रूप से कार्य कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि नक्सलवाद की वैचारिक नींव आदिवासियों की कथित उपेक्षा और “जल-जंगल-जमीन” के मुद्दों पर आधारित थी। सरकार ने इस चुनौती का उत्तर विकास और सम्मान के माध्यम से दिया। “बस्तर ओलंपिक”, “बस्तर पंडुम” जैसे सांस्कृतिक आयोजनों के माध्यम से आदिवासी संस्कृति और अस्मिता को सम्मान दिया गया। इससे आदिवासी समाज के बीच यह विश्वास मजबूत हुआ कि भारतीय संविधान और लोकतांत्रिक व्यवस्था ही उनके वास्तविक हितों की संरक्षक है। भूपेन्द्र सिंह ने कहा कि प्रशासनिक स्तर पर श्री अमित शाह ने एक अभूतपूर्व निर्णय लेते हुए जंगलों के भीतर स्थापित 200 सुरक्षा शिविरों में से 70 को “वीर शहीद गुंडाधुर सेवा डेरों” में बदलने की घोषणा की। जहां पहले बंदूकों का पहरा था, वहां अब सरकार की कल्याणकारी योजनाएं सीधे आदिवासी गांवों तक पहुंचाई जा रही हैं। उन्होंने कहा कि आज जिन इलाकों में कभी चुनावों का बहिष्कार होता था, वहां लोकतंत्र का उत्सव दिखाई देता है। सड़कें, बिजली, मोबाइल टावर, स्कूल और स्वास्थ्य सेवाएं दूरस्थ गांवों तक पहुंच चुकी हैं। आदिवासी अब केवल दर्शक नहीं, बल्कि विकास प्रक्रिया के सक्रिय भागीदार बन रहे हैं। भूपेन्द्र सिंह ने कहा कि यदि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने नक्सलवाद के खात्मे का वैचारिक, नीतिगत और विकास आधारित खाका तैयार किया, तो केन्द्रीय गृह मंत्री श्री अमित शाह ने उसे जमीन पर उतारते हुए कठोर रणनीति, सूक्ष्म योजना और राज्य सरकारों के साथ उत्कृष्ट समन्वय के माध्यम से लागू किया। राजनीति और आंतरिक सुरक्षा के इतिहास में ऐसे उदाहरण बहुत कम मिलते हैं, जब किसी गृह मंत्री ने इतने बड़े और जटिल उग्रवादी नेटवर्क को समाप्त करने के लिए सार्वजनिक समय-सीमा तय की हो और उसे समय से पहले पूरा कर दिखाया हो। उन्होंने कहा कि श्री अमित शाह ने स्पष्ट शब्दों में कहा था — “सीना तानकर कह सकता हूं कि भारत नक्सल मुक्त हो चुका है।” यह केवल राजनीतिक वक्तव्य नहीं, बल्कि हजारों जवानों के बलिदान, सरकार की इच्छाशक्ति और लोकतंत्र की शक्ति की ऐतिहासिक परिणति थी। भूपेन्द्र सिंह ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा विकास, शिक्षा और सुशासन की जो धारा सुदूर आदिवासी क्षेत्रों तक पहुंचाई गई और अमित शाह द्वारा जिस दृढ़ता के साथ सुरक्षा रणनीति लागू की गई, उसने दशकों से हिंसा में उलझे क्षेत्रों को नई दिशा दी। जिन हाथों में कभी हथियार थे, आज उन्हीं हाथों में किताबें, लैपटॉप, खेल सामग्री और रोजगार के अवसर दिखाई दे रहे हैं। उन्होंने कहा कि भारत अब नक्सलवाद के इस काले अध्याय को इतिहास के पन्नों में पीछे छोड़ते हुए “विकसित भारत 2047” और “विकसित बस्तर 2031” की नई यात्रा पर आगे बढ़ चुका है। यह केवल सुरक्षा की जीत नहीं, बल्कि लोकतंत्र, विकास, सुशासन और राष्ट्र की एकता की ऐतिहासिक विजय है |
