
विश्वविद्यालय: योग ‘मन’ पर नियंत्रण लाने का एक सुव्यवस्थित विज्ञान है : प्रो. दिवाकर सिंह राजपूत
सागर। डॉ. हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय, सागर के योग शिक्षा विभाग एवं योग एवं ध्यान केन्द्र द्वारा आयोजित पाँच दिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला “मर्म, एक्यूपंक्चर एवं कपिंग थेरेपी : अवधारणाएँ, तकनीकें एवं प्रायोगिक प्रशिक्षण” का शुभारम्भ महर्षि पतंजलि भवन में गरिमामय वातावरण में सम्पन्न हुआ। कार्यशाला का उद्देश्य भारतीय ज्ञान परम्परा पर आधारित पारम्परिक चिकित्सा पद्धतियों के सैद्धान्तिक एवं व्यावहारिक पक्षों से प्रतिभागियों को परिचित कराना तथा उनके माध्यम से स्वास्थ्य संवर्धन एवं समग्र कल्याण की अवधारणा को सुदृढ़ करना है।
उद्घाटन सत्र के मुख्य अतिथि के रूप में विश्वविद्यालय के डायरेक्टर ऑफ एकेडमिक अफेयर्स प्रो. दिवाकर सिंह राजपूत थे, जबकि कार्यक्रम की अध्यक्षता स्कूल ऑफ एजुकेशनल स्टडीज़ के अधिष्ठाता एवं योग शिक्षा विभागाध्यक्ष प्रो. अनिल कुमार जैन ने की। इस अवसर पर मर्म चिकित्सा के विशेषज्ञ प्रो. अजय दुबे विशिष्ट अतिथि एवं विषय विशेषज्ञ के रूप में उपस्थित रहे।
कार्यक्रम का शुभारम्भ वैदिक मंगलाचरण एवं अतिथियों द्वारा दीप प्रज्वलन के साथ किया गया। इसके उपरान्त शाल, श्रीफल एवं पौधों के माध्यम से मुख्य अतिथि, अध्यक्ष एवं विषय विशेषज्ञों का सम्मान एवं अभिनन्दन किया गया। कार्यक्रम में उपस्थित सभी अतिथियों, शिक्षकों, शोधार्थियों एवं विद्यार्थियों का स्वागत करते हुए कार्यशाला के संयोजक डॉ. अरुण कुमार साव ने अपने स्वागत उद्बोधन में कार्यशाला की रूपरेखा, उद्देश्यों एवं इसकी समकालीन प्रासंगिकता पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि मर्म चिकित्सा, एक्यूपंक्चर एवं कपिंग थेरेपी जैसी पारम्परिक उपचार पद्धतियाँ वर्तमान समय में न केवल स्वास्थ्य संवर्धन बल्कि रोगों की रोकथाम एवं जीवनशैली जनित समस्याओं के समाधान में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं।
मुख्य अतिथि प्रो. दिवाकर सिंह राजपूत ने अपने उद्बोधन में कहा कि भारतीय ज्ञान परम्परा पर आधारित ज्ञान-विज्ञान को पुनर्स्थापित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल है। उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय में इस प्रकार की कार्यशालाएँ विद्यार्थियों, शोधार्थियों एवं शिक्षकों को भारतीय चिकित्सा एवं स्वास्थ्य विज्ञान की समृद्ध परम्पराओं से जोड़ने का कार्य करती हैं तथा शोध एवं नवाचार के नए आयाम स्थापित करती हैं।
अपने विशेषज्ञ व्याख्यान में प्रो. अजय दुबे ने मर्म चिकित्सा की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, उसके वैज्ञानिक आधार तथा व्यावहारिक उपयोगिता पर विस्तार से चर्चा करते हुए कहा कि भारतीय चिकित्सा परम्परा में मर्म विज्ञान का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है और वर्तमान समय में इसके वैज्ञानिक अध्ययन एवं प्रशिक्षण की आवश्यकता पहले से अधिक बढ़ गई है। विभिन्न तकनीकों तथा उनके चिकित्सीय लाभों की जानकारी प्रदान करते हुए कहा कि ये विधियाँ आधुनिक जीवनशैली से उत्पन्न अनेक समस्याओं के समाधान में प्रभावी सिद्ध हो रही हैं।
अध्यक्षीय उद्बोधन में प्रो. अनिल कुमार जैन ने कहा कि योग एवं समन्वित चिकित्सा पद्धतियों के क्षेत्र में अनुसंधान, प्रशिक्षण एवं जनजागरण की अत्यंत आवश्यकता है। उन्होंने आशा व्यक्त की कि यह पाँच दिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला प्रतिभागियों के लिए ज्ञानवर्धक एवं उपयोगी सिद्ध होगी तथा स्वास्थ्य के समग्र दृष्टिकोण को समझने में सहायक बनेगी।
कार्यक्रम के सांस्कृतिक आयाम के अंतर्गत स्नातकोत्तर विद्यार्थियों द्वारा संगीतमय योगासन की आकर्षक प्रस्तुति दी गई, जिसने योग की सौन्दर्यात्मक एवं वैज्ञानिक विशेषताओं को प्रभावी ढंग से प्रदर्शित किया। इसके पश्चात स्नातक वर्ग के विद्यार्थियों द्वारा प्रस्तुत सांस्कृतिक नृत्य ने उपस्थित सम्माननीय अभ्यागत वृंद, अतिथियों व जनसमूह को मंत्रमुग्ध कर दिया। स्नातक विद्यार्थियों द्वारा संगीतबद्ध योगासन की प्रस्तुति ने योग, अनुशासन एवं सामूहिक समन्वय का उत्कृष्ट परिचय दिया, जिसकी सभी उपस्थितजनों ने मुक्त कण्ठ से सराहना की।
कार्यक्रम का प्रभावी एवं सुसंगठित संचालन डॉ. महेन्द्र कुमार शर्मा द्वारा किया गया। अंत में डॉ. बृजेश सिंह ठाकुर ने सभी अतिथियों, विषय विशेषज्ञों, प्रतिभागियों, शिक्षकों एवं विद्यार्थियों के प्रति आभार व्यक्त करते हुए धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत किया। शान्ति पाठ के साथ उद्घाटन सत्र का समापन हुआ।
इस अवसर पर योग शिक्षा विभाग के समस्त शिक्षकगण, शोधार्थी, स्नातक एवं स्नातकोत्तर विद्यार्थी तथा विभिन्न संकायों एवं विभागों से आए प्रतिभागी बड़ी संख्या में उपस्थित रहे। पाँच दिवसीय इस राष्ट्रीय कार्यशाला में प्रतिभागियों को मर्म चिकित्सा, एक्यूपंक्चर एवं कपिंग थेरेपी से संबंधित अवधारणाओं, तकनीकों तथा प्रायोगिक प्रशिक्षण के विविध आयामों से अवगत कराया जाएगा।
