
नवरात्रि विशेष … एक स्वरूप कलकत्ता में दूसरा स्वरूप कलकत्ता वाली मैय्या का मालथौन में विराजमान है माँ की महिमा निराली भक्तों का लगा तांता
■ करीब 800 ईश्वी शताब्दी में मूर्ति की हुई थी स्थापना
सुरेन्द्र जैन मालथौन।
सागर जिले से 60 किलोमीटर मालथौन में अद्भुत अद्वितीय स्वरूप महाकाली का विराजमान है एक कलकत्ता में दूसरा स्वरूप काली कलकत्ता वाली मालथौन के सिद्ध शक्तिपीठ में स्थापित हैं।मां महाकाली के दरबार मे बड़ी मान्यता है यहा देशभर से भक्तगण साल में दो बार नवरात्रि में दर्शनों को पधारते हैं। यहा सच्चे मन से मांगी गई हर मनोकामना को मां पूर्ण करती है।यहां की प्रमुख विशेषता है किवदंती (मूर्ति) एक तो कलकत्ता में विराजमान है दूसरी मालथौन के किला प्रांगण में मातारानी का अद्भुत स्वरूप विराजमान हैं। यहा का इतिहास बहुत प्राचीन हैं। किला परिसर में बने चोपड़ा कुंड में बीजक लगे हुए है वह पाल वंश के राजाओं का इतिहास प्रदर्शित करता है। शक्तिपीठ के बारे में यह किवदंती आम है कलकत्ता और मालथौन की काली मां की प्रतिमा एक हो पत्थर से निर्मित हैं इतिहास में साफ लिखा है बंगाल के पाल वंश द्वारा दुर्लभ काले पत्थर की निर्मित मूर्तियां इस वंश की विशेषता रही है। कहते है कि जब सम्राट हर्ष की 647 इश्वी में मृत्यु हुई तो कन्नौज पर शासन करने के लिये गुर्जर प्रविहार , राष्ट्रकूट तथा पाल वंश के बीच 1200 ई तक संघर्ष चले। कन्नौज सहित उत्तर भारत मे पाल शासन लंबे समय तक चला। बंगाल से इस प्रतिमा को इसी दौरान 800 इश्वी के करीब लाया गया। मूर्ति में प्रयुक्त पत्थर काले हीरे की तरह हैं जिसका किसी मौसम में लाखों वर्ष क्षरण नहीं होता हैं। ऐतहासिक रूप से देखे तो खजुराहो मंदिरों से प्राचीन और दुर्लभ हैं।बताया जाता है कि करीब 800 ईश्वी शताब्दी में बंगाल के राजा महाराजाओं ने किवदंती को स्थापना करवाई गई थी। एक और इतिहास के अल्हा ऊदल के खंड काल मे पथरीगण का उल्लेख हैं उसे पथरीगण की माता रानी भी कहा गया हैं आदि शक्ति महाकाली का अदृत्तीय स्वरूप विराजमान है, मां काली के दरबार मे वर्ष में दो बार भक्तों का रैला लगता है नवरात्रि पर्व पर यहाँ दूर दूर से भक्त मा जगतजननी के दरबार में पूजा अर्चना करने पहुंचते है भक्तगण प्रातः काल की बेला में माँ जगत जननी के दर्शनों से दिन का शुभारंभ कर रहे है यहा की मान्यता है की यहा पर भक्तों द्वारा सच्चे दिल से मांगी गई हर मनोकामना पूर्ण होती है।यहाँ माता रानी के दर्शन मात्र से लोग मन्त्र मुग्ध हो जाते है,तथा शीतलता का अनुभव करते है। अष्टमी और नवमी पर्व पर यहा बर्ष में भक्त दूर दूर से दो बार माता रानी के दर्शनों व पूजा अर्चना को अवश्य पधारते हैं। वैसे यहा भक्तों का साल भर लगा रहता हैं।
