
कहते हैं आवश्यकता ही आविष्कार जननी है। किसी आविष्कार के लिए इंजीनियर होना जरूरी नहीं। सागर के तिली गांव में रहने वाले एक व्यक्ति ने देशी जुगाड़ लगाकर सस्ती घास काटने वाली मशीन बनाकर यह सिद्ध कर दिया है।
उम्र ढलने लगी थी शरीर कमजोर हो रहा था। ऐसे में काम करने में परेशानी आने लगी। धीरे-धीरे काम मिलना कम हो गया। फिर दिमाग में आया कुछ करूंं कि काम भी ज्यादा हो और शरीर को थकान भी न हो। यही सोचते-सोचते एक दिन कबाड़ से एक मोटर उठाई, उसका फ्रेम तैयार किया और ब्लेड लगाकर देशी घास कटर बना लिया। यह कहना है आठवीं तक पढ़े लालसींग लोधी का। उन्होंने बताया कि जब से यह मशीन बनाई है तब से दिनभर में 3-4 एकड़ तक जमीन की घास काट लेते हैं। पहले मुश्किल से आधा एकड़ का घास ही काट पाते थे। मशीन बनने से आय बढ़ गई है। काम भी ज्यादा मिलने लगा है।
जुगाड़ से बनाई मशीन
लालसींग लोधी ने बताया कि घर में पुराना कबाड़ था। जिसमें से एक पानी निकालने वाली मोटर भी जंग खा रही थी। मोटर सुधारकर उसको फ्रेम में फिट किया। लकड़ी के गत्ते लगाए। जिससे घास यहां वहां न फैले। मोटर के निचले हिस्से में कटर ब्लेड लगाई और बिजली से चलने वाली घास कटर मशीन तैयार कर ली।
कम लागत में बनी मशीन
मशीन बनाने का सारा सामान कबाड़ में मिल गया। जिससे मशीन की लागत बहुत कम आई। दो से ढाई हजार रूपए में यह मशीन तैयार हो जाती है।
खरीददार आने लगे
मुझे बाग बगीचों में काम करता देख कई लोग मशीन को बनाने का तरीका पूछते हैं तो कई लोग मशीन बनवाते भी हैं। नई मशीन बनाने की लागत बहुत कम होती है। महज 4 से 5 हजार रूपए में मशीन बनकर तैयार हो जाती है। बाजार में घास काटने वाली नई मशीन की कीमत 50 हजार तक है।
