
किसी का ‘राम’, निकला किसी का ‘रहीम’ — 3 साल बाद लौटेगा अपने परिवार के पास
कुछ कहानियाँ ऐसी होती हैं जो यह विश्वास दिलाती हैं कि इंसानियत हर धर्म, जाति और पहचान से ऊपर होती है। यह कहानी भी ऐसे ही एक मासूम बच्चे की है, जो तीन वर्ष पहले अपने परिवार से बिछड़ गया था और अब आखिरकार अपने अपनों से मिलने जा रहा है।
करीब तीन वर्ष पूर्व एक मुख-बधिर बालक लावारिस अवस्था में मिला था। वह न बोल सकता था और न ही सुन सकता था। उसकी पहचान, उसका नाम और उसका परिवार—सब कुछ अज्ञात था। उस समय घरौंदा आश्रम की संचालिका श्रीमती प्रीति यादव ने उसे अपने संरक्षण में लिया और अपने ही बच्चे की तरह उसका पालन-पोषण शुरू किया।
उस बच्चे के परिजनों की तलाश के लिए लगातार प्रयास किए गए। पुलिस, सामाजिक कार्यकर्ताओं और आश्रम प्रबंधन ने हर संभव कोशिश की, लेकिन कोई सफलता नहीं मिली। समय बीतता गया और वह मासूम आश्रम के परिवार का ही हिस्सा बन गया।
आश्रम में उसे प्यार से “राम” नाम दिया गया। तीन वर्षों तक वह राम बनकर वहीं रहा, सबका स्नेह और अपनापन पाता रहा। किसी ने उसके धर्म या पहचान को नहीं देखा, सभी ने केवल उसकी मासूमियत और उसके दर्द को महसूस किया।
लेकिन कहते हैं कि उम्मीद कभी हारती नहीं।
लगातार प्रयासों के बाद आखिरकार उस बच्चे के वास्तविक परिवार का पता चल गया। जानकारी मिली कि वह मूलतः गुजरात का रहने वाला है और उसका वास्तविक नाम “रहीम” है। परिवार से संपर्क स्थापित हुआ और वर्षों से अपने खोए हुए बेटे की तलाश कर रहे परिजनों की खुशी का ठिकाना नहीं रहा। अब उसका परिवार उसे लेने सागर आने वाला है।
यह सिर्फ एक बच्चे के अपने परिवार से मिलने की कहानी नहीं है, बल्कि यह उस इंसानियत की कहानी है जिसमें तीन साल तक एक मुस्लिम बच्चे को “राम” कहकर उतना ही प्यार मिला, जितना कोई अपने सगे बच्चे को देता है।
आज जब “राम” अपने “रहीम” होने की पहचान के साथ अपने परिवार के पास लौट रहा है, तब यह कहानी समाज को एक सुंदर संदेश देती है—
नाम बदल सकते हैं, धर्म अलग हो सकते हैं, लेकिन प्यार, ममता और इंसानियत का कोई धर्म नहीं होता।
तीन वर्षों तक वह घरौंदा आश्रम का “राम” रहा, अब वह अपने परिवार का “रहीम” बनकर लौटेगा। लेकिन इन तीन वर्षों की यादें, स्नेह और अपनापन हमेशा इस बात की गवाही देंगे कि इंसानियत ही सबसे बड़ा धर्म है।
